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शिक्षा माफिया का पर्दाफाश? RTE से बचने के लिए स्कूलों ने लिया 'Minority Status', अब होगी सख्त जांच; जानें पूरा मामला

Investigation magnifying glass over Right to Education (RTE) Act and Minority Status certificate representing the probe against schools in Nagpur.

नागपुर (Nagpur):
शिक्षा के अधिकार (Right to Education - RTE) के तहत गरीब बच्चों को 25% मुफ्त प्रवेश देने से बचने के लिए प्राइवेट स्कूल किस हद तक जा सकते हैं, इसका एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' (TOI) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नागपुर और आसपास के कई स्कूलों ने सिर्फ RTE से बचने के लिए रातों-रात 'अल्पसंख्यक' (Minority) का दर्जा हासिल कर लिया। अब शिक्षा विभाग ने इन सभी संदिग्ध स्कूलों के खिलाफ कड़ी जांच (Probe) के आदेश दे दिए हैं।

आखिर क्या है यह 'अल्पसंख्यक दर्जे' का खेल?

RTE एक्ट 2009 के तहत सभी प्राइवेट स्कूलों को अपनी एंट्री-लेवल कक्षाओं में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं।

  • कानूनी बचाव (The Loophole): सुप्रीम कोर्ट और संविधान के नियमों के अनुसार, 'अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों' (Minority Educational Institutions) को RTE के इस 25% कोटे से छूट प्राप्त है।
  • फर्जीवाड़ा: इसी नियम का फायदा उठाकर कई मुनाफाखोर स्कूलों ने कागजों में हेराफेरी करके खुद को भाषाई (Linguistic) या धार्मिक (Religious) अल्पसंख्यक घोषित करवा लिया, ताकि उन्हें गरीब बच्चों को मुफ्त में न पढ़ाना पड़े।
  • जांच का दायरा: अब प्रशासन इस बात की जांच कर रहा है कि क्या इन स्कूलों में वास्तव में अल्पसंख्यक समुदाय के 50% छात्र पढ़ते हैं, या यह दर्जा सिर्फ RTE से बचने के लिए 'खरीदा' गया था?

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कब से चल रहा है यह गोरखधंधा?

पिछले कुछ सालों से महाराष्ट्र (विशेषकर नागपुर, पुणे और मुंबई) में अल्पसंख्यक स्कूलों की संख्या में अचानक भारी उछाल आया है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को लंबे समय से संदेह था कि कई नामी स्कूल RTE पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन ब्लॉक करवाने के लिए फर्जी अल्पसंख्यक प्रमाणपत्रों (Minority Certificates) का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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दोषियों पर होगी कड़ी कार्रवाई

शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, जिन स्कूलों ने गलत जानकारी देकर अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त किया है, उनका यह दर्जा रद्द किया जाएगा और उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसके अलावा, उन अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है जिन्होंने बिना सही वेरिफिकेशन के ये सर्टिफिकेट बांटे थे।

शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, कोई व्यापार नहीं। अगर स्कूल सिर्फ गरीब बच्चों से बचने के लिए अल्पसंख्यक दर्जे का ढाल बना रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर RTE कानून की हत्या है। शिक्षा विभाग की यह जांच उन सभी 'फर्जी अल्पसंख्यक स्कूलों' के लिए एक कड़ी चेतावनी है। #timelessindianews इस मामले की हर अपडेट आप तक पहुंचाता रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) ❓

  • Q: क्या अल्पसंख्यक (Minority) स्कूलों में RTE लागू होता है? A: नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को RTE एक्ट की धारा 12(1)(c) से बाहर रखा गया है।
  • Q: जांच में स्कूल दोषी पाए गए तो क्या होगा? A: उनका अल्पसंख्यक दर्जा तुरंत रद्द किया जाएगा, मान्यता छिन सकती है और उन्हें पिछली तारीख से RTE के तहत एडमिशन देने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

पाठकों के लिए सवाल: क्या आपके शहर में भी प्राइवेट स्कूल गरीब बच्चों को एडमिशन देने से कतराते हैं? सरकार को इन पर और क्या सख्त कदम उठाने चाहिए? कमेंट में अपनी राय दें।

डिस्क्लेमर: यह खबर 'टाइम्स ऑफ इंडिया' (TOI) की हालिया रिपोर्ट और महाराष्ट्र शिक्षा विभाग द्वारा शुरू की गई जांच पर आधारित है। किसी भी स्कूल का नाम आधिकारिक रिपोर्ट आने के बाद ही सार्वजनिक किया जाएगा। #timelessindianews

Source Link: Times of India (TOI) - Minority status grants linked to RTE face probe

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