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UGC New Rules 2026: देश भर में यूजीसी के नए नियमों का विरोध क्यों? छात्रों की 5 बड़ी चिंताएं और 'रॉलेट एक्ट' से तुलना की पूरी सच्चाई; पूरी खबर

A split graphic showing protesting students on one side and the UGC logo with a "2026 Rules" header on the other, highlighting the conflict in higher education.

 

नई दिल्ली/शिक्षा डेस्क: यूजीसी के नए 'इक्विटी रेगुलेशन 2026' ने भारतीय उच्च शिक्षा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ सरकार इसे जातिगत भेदभाव मिटाने की दिशा में एक बड़ा कदम बता रही है, वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और मेरठ जैसे शहरों में छात्र इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। आजतक (Aaj Tak) की रिपोर्ट के अनुसार, बरेली के एक मजिस्ट्रेट ने तो इसकी तुलना ब्रिटिश काल के 'रॉलेट एक्ट' (Rowlatt Act) से करते हुए अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया है।

क्या हैं प्रोटेस्टर्स की 5 मुख्य चिंताएं? (The 5 Core Concerns)

  1. दुरुपयोग का डर (Fear of Misuse): छात्रों का आरोप है कि नियमों में 'झूठी शिकायत' करने वालों के खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। इससे निजी दुश्मनी निकालने के लिए कानून का दुरुपयोग हो सकता है।
  2. एकतरफा परिभाषा (One-sided Definition): नए नियमों में 'जातिगत भेदभाव' की परिभाषा को केवल SC, ST और OBC तक सीमित कर दिया गया है। सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों का कहना है कि उन्हें इस सुरक्षा चक्र से बाहर रखकर उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है।
  3. दोष सिद्ध होने से पहले ही सजा (Punishment before Proof): शिकायत दर्ज होने के मात्र 24 घंटे के भीतर कमेटी की बैठक और 15 दिनों में रिपोर्ट का प्रावधान है। छात्रों को डर है कि बिना पूरी जांच के ही उन पर 'अपराधी' का ठप्पा लग जाएगा, जिससे उनका करियर बर्बाद हो सकता है।
  4. कैंपस में अविश्वास का माहौल (Atmosphere of Distrust): विरोधियों का तर्क है कि हर कॉलेज में 'इक्विटी स्क्वाड' और '24x7 हेल्पलाइन' जैसे तंत्र छात्रों के बीच आपसी भरोसे को खत्म कर देंगे और कैंपस एक 'निगरानी जेल' जैसा बन जाएगा।
  5. नेचुरल जस्टिस का अभाव (Lack of Natural Justice): आरोप है कि इन नियमों में आरोपी को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त समय और मंच नहीं दिया गया है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

यूजीसी का क्या है पक्ष?

यूजीसी के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कैंपस में भेदभाव की घटनाओं में वृद्धि हुई है। 2019 के एक अध्ययन का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि 75% वंचित वर्ग के छात्र भेदभाव का सामना करते हैं। नए नियम केवल एक सुरक्षित और समावेशी माहौल सुनिश्चित करने के लिए हैं।

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निष्कर्ष: विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है और एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है। क्या सरकार इन नियमों में संशोधन करेगी या छात्र आंदोलन और उग्र होगा? #timelessindianews आपको इस मामले की हर कानूनी और जमीनी अपडेट देता रहेगा।

⚡️ डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह रिपोर्ट हालिया मीडिया कवरेज (Aaj Tak, Times of India) और यूजीसी के आधिकारिक नोटिफिकेशन पर आधारित है। मामला फिलहाल कोर्ट में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के अधीन होगा। #timelessindianews

Source: Aajtak 

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